Monday, April 12, 2010

CHANGE OUR MANTALITY

विश्व की सबसे घनी मानवीय संपत्ति के धनि देश होते हुए भी छोटे देशो की तुलना में विकसित श्रेणी में नहीं गिना जाता हे .आज भी हम विकासशील हे.आज हर कोई देश चाहे ऑस्ट्रेलिया नेव्ज़िलंद सिगापुर या जापान जेसा  छोटा हो या अमेरिका रूस  चीन  जैसा बड़ा देश क्यों न हो हमारी ही बोद्धिक संपदा के आधार पर विकास कर रहे हे लिकिन हम ज्यो के त्यों हे.इसका मूल कारन हे मानसिकता.और इसकी जड़ हे शिक्षा.मेरी द्रष्टि से शिक्षा को विकास का ही मूल स्त्रोत मन जा सकता हे . शिक्षा यानि एक सकारात्मक सोच ,शिक्षा अर्थात एक उत्पादक शोध ,शिक्षा एक निर्माण.आज आवश्यकता हे शिक्षा को निर्माण से जोड़ने की.शिक्षा वह प्रकाश हे जो अंधकार रूपी अज्ञानता को रौशनी देता हे .शिक्षा रूपी  प्रकाश से हम  उपलब्ध साधन का सकारात्मक उपयोग करते हुए ऐसे निर्माण की खोज करे जो हमें सकारात्मक  परिणाम दे और जो विकास में सहायक हो .इसके लिए सर्वप्रथम लार्ड मेकाले की लिपिकीय शिक्षा प्रणाली को जड़ मूल से हटाना होगा ज केवल अंग्रेजो की तत्कालीन आवशाक्ताओ को पूरा करने के लिए हम पर थोपी  गई थी इसी का दुष्परिणाम हे हमारा युवा सर्वप्रथम  सफेद  कालर नौकरी पद लक्ष्य बनता हे .ये बड़ी विडम्बना हे की इंजिनीअरिंग की हुआ छात्र अन्ततोगत्वा प्रशासनिक सेवा में आपनी नौकरी करता हे जिसका क्षेत्र निर्माण हे शोध हे वह प्रशासन   कर रहा हे .मेकाले की शिक्षा के सबसे बड़ा ड्राबैक यही हे जो केवल लिपिकीय मानसिकता को पोषित करता हे हमारा देश इसी प्रमाणीकृत प्रक्रिया आदि में उल्जा हुआ हे कार्यकारी किसीको नहीं केवल ओपचारिकता पूरी करनी हे किसी विकसित देश का युवा अपने करिअर में लक्ष्य निर्माण या शोध को प्रधानता देता हे जबकि भारत का युवा  रोजगार को प्रथम और अंतिम लक्ष्य होता  हे    इसी मानसिकता को बदलना होगा हमें यदि वास्तविक विकास की और अग्रसर होना हो तो इस मानसिकता को बदलना होगा.शिक्षा पद्धति के परिवर्तन की अब आवश्यकता महसूस की जा रही हे हमें लिपिकीय शिक्षा नहीं वरन निर्माण के लक्ष्य पर चलने वाली शिक्षा की जरुरत हे इस मानसिकता से ही देश की जनसँख्या जन्संपत्ति में परिवर्तित संभावित  हे              

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